Featured Post

Don’t Travel on Memorial Day Weekend. Try New Restaurants Instead.

Food New York TimesBy BY NIKITA RICHARDSON Via NYT To WORLD NEWS

Sunday, April 18, 2021

College Players Graduating to the N.H.L. Have a Chance for Longer Test Run


Sports New York TimesBy BY GARY SANTANIELLO Via NYT To WORLD NEWS

N.F.L. Draft Process Adapts With the Pandemic


Sports New York TimesBy BY EMMANUEL MORGAN Via NYT To WORLD NEWS

John Grisham Leaves the Courtroom for Basketball, and Sudan


Sports New York TimesBy BY SOPAN DEB Via NYT To WORLD NEWS

The Biden administration will push for more Americans to get vaccinated as states expand access.


World New York TimesBy BY SHERYL GAY STOLBERG Via NYT To WORLD NEWS

2 परिवारों के पास है बंगाल की चाबी, मोदी से लेकर ममता तक करते हैं जिक्र

कोलकाता पश्चिम बंगाल की सियासत में दो परिवार ऐसे हैं, जिनका वहां की राजनीति पर खासा असर माना जाता है। अपने-अपने समुदायों के बीच उनकी अहमियत को देखते हुए राजनीतिक दलों में उनका समर्थन पाने की होड़ रहती है। इनमें से एक है घीसिंग परिवार, जो गोरखालैंड इलाके की राजनीति की दिशा तय करता है और दूसरा है ठाकुर नगर का ठाकुर परिवार। मतुआ समुदाय की राजनीति यहीं से तय होती है। अस्सी के दशक में सुभाष घीसिंग के नेतृत्व में गोरखा लोगों के लिए पृथक राज्य की मांग को लेकर गोरखालैंड लिबरेशन फ्रंट बना था। फ्रंट की अगुआई में हुई हिंसक घटनाओं से 1986 से 1988 के बीच जिले का जनजीवन खासा प्रभावित हुआ था। केंद्र और राज्य सरकारों के साथ कई दौर की बातचीत के बाद एक अर्ध स्वायत्त निकाय- दार्जिलिंग गोरखा हिल काउंसिल की स्थापना के साथ इस मसले का हल हुआ। बीजेपी ने मन को दी जिम्मेदारी घीसिंग 1988 से 2008 तक दार्जिलिंग गोरखा हिल काउंसिल के अध्यक्ष रहे। इस बार गोरखालैंड का इलाका टीएमसी और बीजेपी के लिए तो महत्वपूर्ण है ही, घीसिंग परिवार की विरासत के लिए भी बेहद अहम हो गया है। इस चुनाव में बीजेपी ने अपना किला सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी सुभाष घीसिंग के बेटे मन घीसिंग को दे रखी है। घीसिंग का यह है इतिहास घीसिंग की विरासत को समझने के लिए चालीस साल पीछे जाना होगा, जब 1980 में सुभाष घीसिंग ने गोरखा नेशनल लिबरेशन फ्रंट बनाया था। पश्चिम बंगाल के इस इलाके के लिए सुभाष घीसिंग ने ही सबसे पहले गोरखालैंड शब्द का प्रयोग किया। सुभाष घीसिंग का जन्म भी दार्जिलिंग में हुआ था। उन्होंने सेना की नौकरी छोड़कर 60 के दशक से ही गोरखाओं के अधिकारों की लड़ाई लड़ने के लिए अलग-अलग संगठन बनाने की पहल शुरू कर दी थी। राजनीति में मन की ऐसे हुई एंट्री 2015 में जब सुभाष घीसिंग की मौत हुई, तो संगठन की कमान उनके छोटे बेटे मन घीसिंग को दी गई। दिल्ली से पढ़ाई करने वाले मन घीसिंग की हालांकि शुरू से राजनीति में रुचि नहीं थी, लेकिन चूंकि वह शुरू से दार्जिलिंग में अपने पिता के साथ रहते थे, इसलिए उनका परिचय संगठन के लगभग सारे सदस्यों से था। वह सुभाष घीसिंग की दूसरी पत्नी से इकलौती संतान हैं। सुभाष घीसिंग की पहली पत्नी से दो संतानें थीं- सागर और उमा। वे अपने पिता के साथ कभी नहीं रहे, दोनों विदेश में बस चुके हैं। 1996 से 2006 तक यह रहा इतिहास 2015 में जब मन घीसिंग को औपचारिक रूप से संगठन की जिम्मेदारी दी गई, तभी से उनके सामने चुनौती खड़ी होनी शुरू हो गई थी। वैसे इसकी बुनियाद 2007 में ही पड़ गई थी, जब सुभाष घीसिंग के सबसे पुराने सहयोगी बिमल गुरुंग ने अलग होकर अपनी पार्टी बनाई और विनय तमांग बागी पार्टी के प्रमुख बने। 1996 से लेकर 2006 तक इलाके की सभी विधानसभा सीटों पर सुभाष घीसिंग के ही उम्मीदवार जीतते थे। इससे इनके रसूख का पता चलता था। लेकिन दो सहयोगियों के अलग होने का साफ असर पड़ा। 2016 में मन ने दिया ममता का साथ सुभाष घीसिंग पर उनके पुराने शागिर्द बीस पड़ने लगे। इससे घबरा कर 2016 में मन घीसिंग ने ममता बनर्जी का साथ दिया, तो गुरुंग-तमांग बीजेपी के साथ हो गए। 2019 में घीसिंग ने फिर पाला बदला, बीजेपी के उम्मीदवार को सपोर्ट किया और उन्हें जीत मिली। इस बीच गुरुंग-तमांग भी अलग हो गए। इस बार गुरुंग-तमांग को ममता सपोर्ट कर रही हैं, तो घीसिंग बीजेपी के साथ हैं। मतुआ समुदाय के साथ सत्ता की चाबी? इस बार पश्चिम बंगाल में सत्ता की चाबी मतुआ समुदाय के हाथ में बताई जा रही है। इनका वोट हासिल करने के लिए सभी राजनीतिक दल ठाकुर परिवार से अपनी नजदीकी को भुनाने की कोशिश कर रहे हैं। क्या एक परिवार करोड़ों की संख्या वाले इस समुदाय के वोट को प्रभावित कर सकता है? इसके लिए ठाकुर परिवार के इतिहास को और नजदीक से समझना होगा। मतुआ समाज का इतिहास मतुआ समुदाय की शुरुआत 18वीं सदी में हुई थी। हिंदुओं की जाति प्रथा को चुनौती देने वाले इस समुदाय की शुरुआत हरिचंद्र ठाकुर ने की थी। वह क्षेत्र अब बांग्लादेश में पड़ता है। हरिचंद्र ने अपने समुदाय में अपने नैसर्गिक ज्ञान का प्रसार किया। इससे समुदाय में इनके प्रति श्रद्धा उमड़ी और लोग इन्हें भगवान का अवतार मानने लगे। इसके साथ ही मतुआ समुदाय का भी विस्तार होने लगा। बाद में ठाकुर परिवार बांग्लादेश से पश्चिम बंगाल आकर बस गया। पीढ़ी दर पीढ़ी ठाकुर परिवार समुदाय के लिए आराध्य बना रहा। बाद में हरिचंद्र ठाकुर के पड़पोते परमार्थ रंजन ठाकुर समुदाय के प्रतिनिधि बने। उनकी शादी बीनापाणि देवी से हुई थी, जिन्हें आज 'मतुआ माता' के नाम से जाना जाता है। मतुआ परिवार का राजनीति में प्रवेश आजादी के बाद इस परिवार ने साठ के दशक में राजनीति में प्रवेश किया। परमार्थ रंजन ठाकुर राज्य की नादिया सीट से विधायक बने। उनका निधन 1990 में हुआ, जिसके बाद उनकी पत्नी संप्रदाय का प्रतिनिधित्व करने लगीं। इनका भी 2019 में निधन हो गया। जहां तक इनकी राजनीतिक विचारधारा का सवाल है, वक्त के हिसाब से इनके स्टैंड में बदलाव आता रहा है। 2019 आम चुनाव में इस समुदाय ने बड़ी संख्या में बीजेपी को वोट किया था, जिससे इनके प्रभाव वाली सभी सीटों पर बीजेपी को जीत मिली थी। लेकिन उसके बाद ममता बनर्जी ने भी इन्हें अपने पक्ष में करने के लिए बहुत कोशिश की। बीनापाणि के परिवार में ऐसे पड़ी फूट 2014 में परिवार ममता के साथ ही था। तब बीनापाणि देवी के बड़े पुत्र कपिल कृष्ण ठाकुर टीएमसी के टिकट पर आम चुनाव में उतरे थे, और उन्हें जीत मिली थी। लेकिन जब अगले साल उनका निधन हो गया, तो उनकी पत्नी ममता बाला ठाकुर को टीएमसी ने टिकट दिया और वह भी जीतीं। दरअसल, जब तक बीनापाणि देवी जीवित थीं, तब तक परिवार एक स्वर में बात करता था। लेकिन उनके बाद परिवार के अंदर सियासी स्टैंड पर भी मतभेद दिखने लगे। इसलिए पीएम शांतनु को ले गए थे बांग्लादेश बीनापाणि के छोटे पुत्र मंजुल कृष्ण ठाकुर बीजेपी में शामिल हो गए। इसके बाद 2019 में बीजेपी ने उनके बेटे शांतनु ठाकुर को राज्य के बनगांव लोकसभा सीट से टिकट भी दिया। वह जीते भी थे। उन्होंने ममता बाला ठाकुर को ही परास्त किया। यही कारण है कि जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पिछले महीने बांग्लादेश के दौरे पर गए थे, तो अपने साथ शांतनु ठाकुर को भी ले गए थे।

चल मुर्गा बन जा... नियम तोड़ने वालों पर बरस पड़ता है MP का यह 'लठबाज' IPS

सड़क पर मुर्गा बन बैठे लोग, हेकड़ी दिखाने वाले लोगों पर ताबड़तोड़ लाठी बरसाते पुलिस अफसर...ये नजारा मध्यप्रदेश के छतरपुर जिले का है। कोविड नियमों को तोड़ रहे लोगों को ऐसे ही एक आईपीएस अफसर सबक सिखा रहे हैं। उनकी शैली पर सवाल भी उठ रहे हैं। वहीं, कुछ लोग तारीफ भी कर रहे हैं। सवाल यह है कि नियम तोड़ने वाले लोगों को सड़क पर पिटाई क्यों। वहीं, बढ़ते संक्रमण के बीच कुछ लोग इस तरीके को सही ठहरा रहे हैं।

कोरोना की वजह से एमपी के 20 से ज्यादा जिलों में कर्फ्यू लागू है। उसके बावजूद कुछ लोग सड़क पर अपनी जान की परवाह किए बगैर तफरी के लिए निकल जाते हैं। ऐसे लोगों को छत्तरपुर जिले में एक आईपीएस अधिकारी सबक सिखा रहे हैं।


चलो मुर्गा बन जाओ... नियम तोड़ने वालों पर बरस पड़ता है MP का यह 'लठबाज' IPS

सड़क पर मुर्गा बन बैठे लोग, हेकड़ी दिखाने वाले लोगों पर ताबड़तोड़ लाठी बरसाते पुलिस अफसर...ये नजारा मध्यप्रदेश के छतरपुर जिले का है। कोविड नियमों को तोड़ रहे लोगों को ऐसे ही एक आईपीएस अफसर सबक सिखा रहे हैं। उनकी शैली पर सवाल भी उठ रहे हैं। वहीं, कुछ लोग तारीफ भी कर रहे हैं। सवाल यह है कि नियम तोड़ने वाले लोगों को सड़क पर पिटाई क्यों। वहीं, बढ़ते संक्रमण के बीच कुछ लोग इस तरीके को सही ठहरा रहे हैं।



छतरपुर के एसपी हैं यह आईपीएस
छतरपुर के एसपी हैं यह आईपीएस

एमपी के छतरपुर जिले में भी कोरोना की रफ्तार पहले की तुलना में इस बार तेज है। ऐसे में एक आईपीएस अफसर ने लोगों को सुधारने की ठानी है। खासकर वैसे लोगों को जो बिना काम के सड़कों पर तफरी के लिए निकल रहे हैं। ये वो लोग हैं, जो अपनी जान के साथ-साथ दूसरे लोगों की जिंदगी से भी खिलवाड़ कर रहे हैं। इन लोगों को सबक सिखाने के लिए छतरपुर एसपी सचिन शर्मा खुद ही मैदान में उतर गए हैं। संकीर्ण सड़कों पर वह अपनी टीम के साथ बाइक से निकल रहे हैं।



सड़कों पर पसर जाता सन्नाटा
सड़कों पर पसर जाता सन्नाटा

आईपीएस सचिन शर्मा जब अपनी टीम के साथ बाइक से सायरन बचाते हुए निकलते हैं तो सड़कों पर सन्नाटा पसर जाता है। सचिन लोगों से लगातार अपील कर रहे हैं कि बिना काम के घरों से नहीं निकले। साथ ही पुलिस को भी उन्होंने सख्त निर्देश दे रखे हैं कि कोरोना नियम तोड़ने वाले लोगों से सख्ती के साथ निपटा जाए। खुद ही पुलिस की टीम के साथ सड़कों पर चेकिंग के लिए उतर जाते हैं।



मास्क नहीं पहनने वालों को बनाते हैं मुर्गा
मास्क नहीं पहनने वालों को बनाते हैं मुर्गा

पुलिस की टीम के साथ आईपीएस सचिन शर्मा कहीं भी मास्क की चेकिंग लगा देते हैं। इस दौरान बिना मास्क पकड़े जाने वाले लोगों को सड़क पर ही मुर्गा बनाते हैं। कई लोग ऐसे भी होते हैं, जो आनाकानी करते हैं। इस दौरान पुलिस टीम उनसे सख्ती बरतती है।



लाठियों से 'तोड़' देते देह
लाठियों से 'तोड़' देते देह

चेकिंग के दौरान कई लोग धौंस भी जमाते हैं। साथ ही मुर्गा बनने से इनकार करते हैं। ऐसे लोगों को आईपीएस सचिन शर्मा खुद ही सबक सिखाते हैं। उनकी लाठियों से पिटाई शुरू कर देते हैं। लाठी से पिटाई शुरू होने के बाद वह खुद ब खुद मुर्गा बन जाते हैं। इस दौरान भी सचिन शर्मा लाठी से पिटाई करते हैं। अब सोशल मीडिया पर आईपीएस सचिन शर्मा का वीडियो वायरल है।



परिवार का रखें ख्याल
परिवार का रखें ख्याल

वहीं, एसपी सचिन शर्मा ने कहा है कि छतरपुर जिले के सभी निवासी कोरोना संक्रमण के दौरान अपने और परिवार के लोगों का ख्याल रखें। अगर आवश्यक काम से बाहर निकलते हैं तो मास्क पहनें और सोशल डिस्टेसिंग का पालन करें। साथ ही कोरोना के नियमों का भी पालन करें। आत्मअनुशासन के माध्यम से ही हम इस महामारी पर काबू कर पाएंगे। इसके साथ ही उनका कहना है कि लोगों की सुरक्षा के लिए जो उन्हें सही लग रहा है, वहीं कर रहे हैं और आगे भी करते रहेंगे।



पति पॉजिटिव फिर भी करती रहीं इलाज.... यकीन रखें इन 'देवदूतों' से हारेगा कोरोना

नई दिल्ली'मैं डॉक्टर हूं। कोरोना की वजह से मैं छिपकर घर में नहीं बैठ सकती थी। मेरा काम है और काम से बढ़कर जिम्मेदारी है। लेकिन घर, परिवार और बच्चे व बुजुर्ग की चिंता हमें भी होती है। इसके बाद भी संक्रमण के डर के बीच हमने पूरे साल काम किया और आज भी कर रही हूं।' ये शब्द हैं आईवीएफ एक्सपर्ट एवं जेनस्ट्रिंग्स डायग्नोस्टिक की फाउंडर डॉक्टर गौरी अग्रवाल के। जिम्मेदारी सबसे ऊपर: डॉ. गौरी उन्होंने कहा कि जब कोरोना की शुरुआत हुई थी, हमें नहीं पता था कि यह कब तक चलेगा। अस्पताल या लैब से घर आते हुए डर लगता था कि कहीं मैं अपने परिवार के लिए संक्रमण का कैरियर न बन जाऊं। एक-एक दिन निकालना मुश्किल हो रहा था लेकिन हिम्मत नहीं हारी। पति पॉजिटिव हो गए, फिर भी मरीजों का इलाज और जांच जारी रखा क्योंकि जो हालात हैं, उसमें जिम्मेदारी सबसे ऊपर है। घर से लैकर, चुनौतियां ही चुनौतियां डॉक्टर गौरी ने कहा कि घर में सास ससुर, दो बच्चे और पति हैं। पति भी डॉक्टर हैं। पिछले साल लॉकडाउन की घोषणा हो गई। मेड का आना बंद हो गया। घर की सफाई से लेकर खाना बनाना, दो-दो बच्चों को पालना और उसके बाद अस्पताल और लैब के काम। मेरी एक 5 साल की बेटी है, उसकी ऑनलाइन क्लास शुरू हो गई। वर्किंग पैरंट्स की वजह से दोनों में से कोई काम नहीं छोड़ सकते थे, क्योंकि इस समय हम दोनों की जरूरत समाज और देश को थी। मजबूरी में बच्ची की पढ़ाई प्रभावित हुई, लेकिन मरीजों के इलाज, जांच में हमने कोई कमी नहीं होने दी। हालात यह थे कि घरवाले कहने लगे कि काम छोड़ दो, लेकिन जब महामारी फैली हो तो एक डॉक्टर कैसे घर बैठ सकता है। ...जब डॉक्टर पति हो गए पॉजिटिव जिस तेजी से संक्रमण फैलता जा रहा था, डॉक्टरों के ऊपर भी बोझ बढ़ता जा रहा था। विदेश से आने वाले हर किसी की जांच का काम हमारी लैब के पास है। यह ऐसा काम है जिसे किसी भी हाल में छोड़ नहीं सकते। लेकिन संक्रमण का खतरा भी उतना ही है। आज एयरपोर्ट पर जांच करने वाले हमारे 300 स्टाफ में से 30 पर्सेंट पॉजिटिव हैं। मैनपावर कम पड़ना, नए को रिक्रूट करना, ठीक से काम कराना, आसान नहीं है। ऊपर से मेरे पास इलाज करा रही प्रेग्नेंट महिलाएं, जिसमें सेरोगेट मदर भी होती हैं, इनका फॉलोअप बीच में नहीं रुक सकता। इस जंग के बीच पति दिसंबर में कोविड पॉजिटिव हो गए। हमने फ्लोर बांट लिया, ताकि बाकी लोगों को संक्रमण नहीं हो। दूसरी लहर के लिए सभी जिम्मेदार: डॉ. गौरी हालांकि, डॉक्टर गौरी का यह भी कहना है कि कोविड की दूसरी लहर के लिए हम सभी जिम्मेदार हैं। सभी रिलैक्स हो गए, सेलिब्रेशन मोड में आए। वैक्सीन आई तो अभी तक युवाओं को नहीं लग रही है। संक्रमण तेजी से फैलने की वजह नए वैरिएंट भी हो सकते हैं, लेकिन युवाओं में वैक्सीनेशन नहीं होने की वजह से इस बार उनमें संक्रमण ज्यादा देखा जा रहा है, यह भी एक कारण हो सकता है। जिस तरह पूरा साल बीता है और अभी भी उसी दौर में है, हमें और सख्ती से नियमों का पालन करना जरूरी है।